Friday, August 14, 2009

कबीर का यह दोहा

हां तो बात चल रही थी कबीर के दोहे पर...
कि

लकड़ी जल कोयला भई कोयला जल भई राख।
मैं बावरि ऐसी जली कोयला भई ना राख।।
बचपन में जैसा कि खयाल आता है इसका अर्थ मुझे यही समझ में आता था कि लकड़ी जल कर कोयला हो गयी और कोयला राख.. मैं पगली ऐसी जली कि कहीं की ना रही। सामान्‍यतया हिन्‍दी के प्राध्‍यापक भी शायद इसका कुछ ऐसा ही अर्थ करें।
बात कुछ जमती नहीं.. क्‍या कबीर ने इस दोहे में अपने जीवन की निस्‍सारता के प्रति इंगित किया है या कुछ और है जो इस दोहे में छिपा हुआ है।

अवधी में एक शब्‍द है बंवर.. जिसका अर्थ आप लतागुल्‍म या झाड़ी जैसा कुछ लगा सकते हैं। 'मैं बावरि' मतलब 'मैं' यानी अहंकार की बंवर। अब आगे देखिए..

लकड़ी जल कोयला भई, कोयला भई राख.. और मेरे अहंकार की बंवर ऐसी जली कि न कोयला हुई न ना राख।
रह गयी लकड़ी और कोयला.. इसका क्‍या अर्थ..

लकड़ी का जल कर कोयला होना और कोयला का राख होना ये प्रकृति के नियमों के अन्‍तर्गत है.. मगर अहंकार तो ऐसे जला कि वहां प्रकृति के कोई नियम लागू ही नहीं हुए। यहां कबीर द्वैत से परे किसी ऐसी चेतना-भूमि पर खड़े हैं जहां प्रकृति के नियम अवरुद्ध हो गये हैं।

कुल मिलाकर कबीर का यह दोहा उनकी साधना के उस स्‍तर से नि:सृत है जहां उनका उनका अहंकार उन्‍मूलित हो चुका है.. और उनके अहंकार की बंवर (झाल-झंखाड़) ब्रह्माग्नि में भस्‍मीभूत हो रहे हैं।

चलिए बहुत हो गया अभी के लिए इतना ही... क्‍या खयाल है आपका।

3 comments:

  1. स्वतंत्रा दिवस जी हार्दिक शुभकामनाएँ

    ReplyDelete
  2. यह दोहा मैंने भी पढ़ा था और वही अर्थ समझता था, जैसा कि लोग समझते हैं। कबीर की इस नई व्याख्या पर बधाई।

    ReplyDelete
  3. आशीष जी,
    आपने कबीर के दोहो की सही व्याख्या की है। कबीर ने मनुष्य के अहंकार को तोड़ने के लिए ही ऐसा कहा है। वास्तव में मनुष्य स्वयं को सृष्टि का सर्वोत्तम प्राणी मानता है। उसी अभिमान को कबीर ने इसमें तोड़ा है। मनुष्य तो लकड़ी और कोयले से भी हीन है। न जीवित रहते किसी के काम आता है न मरकर।

    ReplyDelete